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यूएपीए और पीएसए जैसे क़ानून लोकतंत्र की आत्मा पर आघात हैं :मोहम्मद अरशद खान

महफूज़ अहमद


👉इन्हें मीसा, टाडा और पोटा की तरह समाप्त किया जाए

लखनऊ/जौनपुर। पीडीए भवन, कटघरा, जौनपुर में आयोजित एक महत्वपूर्ण संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं जौनपुर सदर के पूर्व विधायक मोहम्मद अरशद खान ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्याय, समानता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। लेकिन यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम) और पीएसए (पब्लिक सेफ्टी एक्ट) जैसे कठोर क़ानून लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक स्वतंत्रताओं को कमजोर कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार आपातकाल के दौरान लागू मीसा (MISA) तथा बाद में टाडा (TADA) और पोटा (POTA) जैसे क़ानूनों का व्यापक दुरुपयोग हुआ और लोकतांत्रिक जागरूकता एवं जनदबाव के कारण उन्हें समाप्त करना पड़ा, उसी प्रकार आज यूएपीए और पीएसए भी देश में नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं।

मोहम्मद अरशद खान ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं में निहित होती है, न कि भय, दमन और असहमति की आवाज़ को दबाने में। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को बिना निष्पक्ष सुनवाई, पर्याप्त साक्ष्य और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया के वर्षों तक जेल में रखा जाता है, तो यह संविधान की आत्मा और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

उन्होंने कहा कि आतंकवाद, हिंसा और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन उसके नाम पर लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। कानून का उद्देश्य न्याय स्थापित करना होना चाहिए, न कि प्रतिशोध और भय का वातावरण बनाना।

मोहम्मद अरशद खान ने केंद्र सरकार से मांग की कि उन सभी क़ानूनों की व्यापक संवैधानिक समीक्षा कराई जाए, जिनके अंतर्गत निर्दोष नागरिकों, छात्रों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के उत्पीड़न और अन्याय के आरोप सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं माना जा सकता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।

उन्होंने आगे कहा कि भारत बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान से चलेगा, किसी निरंकुश या दमनकारी मानसिकता से नहीं। लोकतांत्रिक परंपराओं, मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना देश के प्रत्येक नागरिक और राजनीतिक संगठन की सामूहिक जिम्मेदारी है।

मोहम्मद अरशद खान ने केंद्र सरकार, सर्वोच्च न्यायालय और सभी संवैधानिक संस्थाओं से अपील की कि देशभर में कश्मीर से कन्याकुमारी तक यूएपीए और पीएसए जैसे क़ानूनों के अंतर्गत बंद सभी विचाराधीन कैदियों, छात्रों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और निर्दोष नागरिकों के मामलों की तत्काल समीक्षा कर उन्हें जुलाई 2026 तक सामूहिक रूप से जमानत पर रिहा किया जाए। उन्होंने कहा कि वर्षों तक मुकदमों को लंबित रखकर लोगों को जेल में बंद रखना लोकतंत्र और संविधान दोनों के साथ अन्याय है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस दिशा में कोई ठोस और सकारात्मक कदम नहीं उठाती है, तो अगस्त 2026 से पूरे देश में “संविधान बचाओ – लोकतंत्र बचाओ” अभियान के तहत एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक जनआंदोलन शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन मानवाधिकारों, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित होगा तथा ऐसी स्थिति के लिए केंद्र सरकार की नीतियां जिम्मेदार होंगी।

अंत में उन्होंने कहा कि समाजवादी विचारधारा हमेशा लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार और संविधान की रक्षा के पक्ष में खड़ी रही है और आगे भी इन सिद्धांतों के लिए मजबूती से संघर्ष करती रहेगी।

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